BAAS SPEAK UP

BAAS SPEAK UP
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) की आजीवन प्राथमिक सदस्यता का नवीनतम जीरो (0) नंबर फॉर्म यहाँ पर क्लिक करके डाउन लोड और प्रिंट किया जा सकता है!
‘यदि आपका कोई अपना या परिचित पीलिया रोग से पीड़ित है तो इसे हलके से नहीं लें, क्योंकि पीलिया इतना घातक है कि रोगी की मौत भी हो सकती है! इसमें आयुर्वेद और होम्योपैथी का उपचार अधिक कारगर है! हम पीलिया की दवाई मुफ्त में देते हैं! सम्पर्क करें : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, 0141-2222225, 98285-02666

PRESSPALIKA NEWS CHANNEL-प्रेसपालिका न्यूज चैनल

Showing posts with label सूचना आयोग. Show all posts
Showing posts with label सूचना आयोग. Show all posts

25.12.11

सूचना का अधिकार अधिनियम में तीन संशोधन!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

प्रारम्भ में जब सूचना अधिकार कानून की लड़ाई लड़ी जा रही थी तो आम लोगों को इस कानून से भारी उम्मीद थी| लेकिन जैसे ही इस कानून से सच्चाई बाहर आत दिखी तो अफसरशाही ने इस कानून की धार को कुन्द करने के लिये नये-नये रास्ते खोजना शुरू कर दिये| जिसे परोक्ष और अनेक बार प्रत्यक्ष रूप से न्यायपालिका ने भी संरक्षण प्रदान किया है| अन्यथा अकेला सूचना का अधिकार कानून ही बहुत बड़ा बदलाव ला सकता था| एक समय वाहवाही लूटने वाले सत्ताधारी भी इस कानून को लागू करने के निर्णय को लेकर पछताने लगे हैं| जिसके चलते इस कानून को भोथरा करने के लिये कई बार इसमें संशोधन करने का दुस्साहस करने का असफल प्रयास किया गया| जिसे इस देश के लोगों की लोकतान्त्रिक शक्ति ने डराकर रोक रखा है|

इसके बावजूद भी सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 को सही तरह से लागू करने और सच्चे अर्थों में क्रियान्वित करने के मार्ग में अनेक प्रकार से व्यवधान पैदा किये जा रहे हैं| अधिकतर कार्यालयों में जन सूचना अधिकारियों द्वारा मूल कानून में निर्धारित 30 दिन में सूचना देने की समय अवधि में जानबूझकर और दुराशयपूर्वक आवेदकों को उपलब्ध होने पर भी सूचना उपलब्ध नहीं करवाई जाती है या गुमराह करने वाली या गलत या अस्पष्ट सूचना उपलब्ध करवाई जाती है|

जन सूचना अधिकारियों द्वारा निर्धारित 30 दिन की समयावधि में सही/पूर्ण सूचना उपलब्ध नहीं करवाये जाने के मनमाने, गलत और गैर-कानूनी निर्णय का अधिकतर मामले में प्रथम अपील अधिकारी भी आंख बन्द करके समर्थन करते हैं| ऐसे अधिकतर मामलों में केन्द्रीय/राज्य सूचना आयोगों द्वारा लम्बी सुनवाई के बाद आवेदकों को चाही गयी सूचना प्रदान करने के आदेश तो दिये जाते हैं, लेकिन जानबूझकर निर्धारित 30 दिन की समयावधि में सूचना उपलब्ध नहीं करवाने के दोषी जन सूचना अधिकारियों तथा उनका समर्थन करने वाले प्रथम अपील अधिकारियों के विरुद्ध कठोर रुख अपनाकर दण्डित करने के बजाय नरम रुख अपनाया जाता है| 

जिसके चलते सूचना आयोगों में द्वितीय अपीलों की संख्या में लगातार बढोतरी हो रही है| सूचना का अधिकार कानून में निर्धारित आर्थिक दण्ड अधिरोपित करने के मामले में सूचना आयोग को अपने विवेक का उपयोग करके कम या अधिक दण्ड देने की कोई व्यवस्था नहीं होने के उपरान्त भी केन्द्रीय और राज्य सूचना आयोगों द्वारा अपनी पदस्थिति का दुरुपयोग करते हुए अधिकतर मामलों में निर्धारित दण्ड नहीं दिया जा रहा है| अधिक दण्ड देने का तो सवाल ही नहीं उठता| यहॉं तक कि यह बात साफ तौर पर प्रमाणित हो जाने के बाद भी कि प्रारम्भ में सूचना जानभूझकर नहीं दी गयी है| जन सूचना अधिकारियों के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही की अनुशंसा नहीं की जा रही हैं| यही नहीं ऐसे मामलों में भी प्रथम अपील अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह से बचे हुए हैं| उन्हें दण्डित किये बिना, उनसे उनके दायित्वों का निर्वाह करवाना लगभग असम्भव है| इस वजह से भी केन्द्रीय व राज्यों के सूचना आयोगों में अपीलों का लगातार अम्बार लग रहा है|

इन हालातों में यह बात साफ तौर पर कही जा सकती है कि सूचना का अधिकार कानून के तहत आवेदकों को सही समय पर सूचना नहीं मिले, इस बात को परोक्ष रूप से सूचना आयोग ही प्रोत्साहित कर रहे हैं| मूल अधिनियम में सूचना आयोगों के लिये द्वितीय अपील का निर्णय करने की समय सीमा का निर्धारण नहीं किया जाना भी इसकी बड़ी वजह है|

यदि जन सूचना अधिकारी एवं उनके गलत निर्णय का समर्थन करने के दोषी पाये जाने वाले सभी प्रथम अपील अधिकारियों को भी अधिकतम आर्थिक दण्ड 25000 रुपये से दण्डित किये जाने के साथ-साथ निर्धारित अवधि में अनुशासनिक कार्यवाही किये जाने की अधिनियम में ही स्पष्ट व्यवस्था हो और सूचना आयोगों द्वारा इसका काड़ाई से पालन किया जावे तो 90 प्रतिशत से अधिक आवेदकों को प्रथम चरण में ही अधिकतर और सही सूचनाएँ मिलने लगेंगी| इससे सूचना आयोगों के पास अपीलों में आने वाले प्रकरणों की संख्या में अत्यधिक कमी हो जायेगी| जिसका उदाहरण मणीपुर राज्य सूचना आयोग है, जहॉं पर सूचना उपलब्ध नहीं करवाने के दोषी जन सूचना अधिकारियों पर दण्ड अधिरोपित करने में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता है, जिसके चलते मणीपुर राज्य सूचना आयोग में अपीलों की संख्या चार अंकों में नहीं है| अधिकतर मामलों में जन सूचना अधिकारी ही सूचना उपलब्ध करवा देते हैं|

दूसरा यह देखने में आया है कि लम्बी जद्दोजहद के बाद यदि केन्द्रीय/राज्य सूचना आयोगों द्वारा आवेदक को सूचना प्रदान करने का निर्देश जारी कर भी दिया जाता है तो ब्यूरोक्रट्स हाई कोर्ट/सुप्रीम कोर्ट की शरण में चले जाते हैं| जहॉं पर मामले में सूचना नहीं देने के लिये स्थगन आदेश मिल जाता है और अन्य मामलों की भांति ऐसे मामले भी तारीख दर तारीख लम्बे खिंचते रहते हैं, जिससे सूचना अधिकार कानून का मकसद ही समाप्त हो रहा है| इस प्रक्रिया की आड़ में भ्रष्ट ब्यूरोक्रेट्स अपने काले कारनामों को लम्बे समय तक छिपाने और दबाने में कामयाब हो रहे हैं|

अत: बहुत जरूरी है कि सूचना अधिकार से सम्बन्धित जो भी मामले हाई कोर्ट/सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश हों उनमें सुनवाई और निर्णय करने की समयावधि निर्धारित हो| इस व्यवस्था से कोर्ट की आड़ लेकर सूचना को लम्बे समय तक रोकने की घिनौनी तथा गैर-कानूनी साजिश रचने वाले भ्रष्ट ब्यूरोक्रेट्स की चालों से सूचना अधिकार कानून को बचाया जा सकेगा|

इस प्रकार सूचना का अधिकार कानून को अधिक पुख्ता बनाने के लिये सूचना का अधिकार आन्दोलन से जुड़े लोगों को इस बात के लिये केन्द्रीय सरकार पर दबाव डालना चाहिये कि संसद के मार्फत इस कानून में निम्न तीन संशोधन किये जावें :-

1. जन सूचना अधिकारी और प्रथम अपील अधिकारी के दोषी पाये जाने पर जो आर्थिक दण्ड दिया जायेगा, उसमें केन्द्रीय/राज्य सूचना आयोगों या न्यायालयों को विवेक के उपयोग करने का कोई अधिकार नहीं होगा| सूचना देने में जितने दिन का विलम्ब किया गया, उतने दिन का आर्थिक जुर्माना जन सूचना अधिकारियों और प्रथम अपील अधिकारियों को पृथक-पृथक समान रूप से अदा करना ही होगा| साथ ही दोषी पाये जाने वाले सभी जन सूचना अधिकारियों और सभी प्रथम अपील अधिकारियों के विरुद्ध भी अनिवार्य रूप से अनुशासनिक कार्यवाही की अनुशंसा भी की जाये| अनुशासनिक कार्यवाही की अनुशंसा करने का प्रावधान सूचना आयोगों के विवेक पर नहीं छोड़ा जाना चाहिये, क्योंकि जब सूचना नहीं दी गयी है तो इसे सिद्ध करने की कहॉं जरूरत है कि सूचना नहीं देने वाला जन सूचना अधिकारी अनुशासनहीन है| जिसने अपने कर्त्तव्यों का कानून के अनुसार सही सही पालन नहीं किया है, उस लोक सेवक का ऐसा कृत्य स्वयं में अनुशासनहीनता है, जिसके लिये उसे दण्डित किया ही जाना चाहिये| केवल इतना ही नहीं, अनुशासनहीनता के मामलों में सम्बन्धित विभाग द्वारा दोषी लोक सेवक के विरुद्ध अधिकतम एक माह के अन्दर निर्णय करके की गयी अनुशासनिक कार्यवाही के बारे में केन्द्रीय/राज्य सूचना आयोग को भी अवगत करवाये जाने की बाध्यकारी व्यवस्था होनी चाहिये| साथ ही ये व्यवस्था भी हो कि यदि सम्बन्धित विभाग द्वारा एक माह में अनुशासनिक कार्यवाही नहीं की जावे तो एक माह बाद सम्बन्धित सूचना आयोग को बिना इन्तजार किये सीधे अनुशासनिक कार्यवाही करने का अधिकार दिया जावे| जिस पर सूचना आयोग को अगले एक माह में निर्णय लेना बाध्यकारी हो| इसके अलावा विभाग द्वारा की गयी अनुशासनिक कार्यवाही के निर्णय का सूचना आयोग को पुनरीक्षण करने का भी कानूनी हक हो|

2. कलकत्ता हाई कोर्ट के एक निर्ण में की गयी व्यवस्था के अनुसार सूचना अधिकार कानून में द्वितीय अपील के निर्णय की समय सीमा अधिकतम 45 दिन निर्धारित किये जाने की तत्काल सख्त जरूरत है|

3. सूचना अधिकार कानून में ही इस प्रकार की साफ व्यवस्था की जावे कि इस कानून से सम्बन्धित जो भी मामले हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत हों, उनकी प्रतिदिन सुनवाई हो और अधिकतम 60 दिन के अन्दर-अन्दर उनका अन्तिम निर्णय हो| यदि साठ दिन में न्यायिक निर्णय नहीं हो तो पिछला निर्णय स्वत: ही क्रियान्वित हो| कोर्ट के निर्णय के बाद दोषी पाये जाने अधिकारियों के विरुद्ध जुर्माने के साथ-साथ कम से कम 9 फीसदी ब्याज सहित जुर्माना वसूलने की व्यवस्था भी हो|

यदि सूचना अधिकार आन्दोलन से जुड़े कार्यकर्ता इन विषयों पर जनचर्चा करें और जगह-जगह इन बातों को प्रचारित करें तो कोई आश्‍चर्य नहीं कि ये संशोधन जल्दी ही संसद में विचारार्थ प्रस्तुत कर दिये जावें| लेकिन बिना बोले और बिना संघर्ष के कोई किसी की नहीं सुनता है| अत: बहुत जरूरी है कि इस बारे में लगातार संघर्ष किया जावे और हर हाल में इस प्रकार से संशोधन किये जाने तक संघर्ष जारी रखा जावे|

7.9.11

सुप्रीम कोर्ट में दो करोड़ 39 लाख मेडीकल खर्च का रिकॉर्ड ही नहीं?

सूचना अधिकार कानून के तहत हुआ खुलासा

सुप्रीम कोर्ट में दो करोड़ 39 लाख 

मेडीकल खर्च का रिकॉर्ड ही नहीं?
सुप्रीम कोर्ट के मामले में सीआईसी की बोलती बन्द क्यों हो जाती है?

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

जनता की गा़ढ़ी कमाई से टैक्स के जरिये संग्रहित सरकारी खजाने से यदि एक रुपया भी किसी मद पर खर्च होता है तो उसका बाकायदा हिसाब-किताब रखा जाना कठोर कानूनी व्यवस्था है| किसी को भी, किसी भी मद पर किसी भी प्रकार का नगद या चैक से भुगतान किया जाता है तो उसका स्पष्ट लेखा-जोखा रखा जाता है| जिसके लिये हर सरकारी दफ्तर में लेखा अधिकारी नियुक्त हैं, जो इस काम के बदले सरकारी खाजने से वेतन पाते हैं|

13.3.11

सूचना आयोगों द्वारा ब्यूरोक्रेसी को बचाने के चक्कर में अपीलों का बढता अम्बार?



डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

कुछ समय पूर्व उत्तर प्रदेश में राज्य सूचना आयोग ने एक तरह से अपने हाथ खड़े करते हुए सार्वजनिक रूप से कहा कि ‘‘अब हम इन लोक सूचना अधिकारियों का कुछ नहीं कर सकते|’’ यह निराशापूर्ण हताशा उत्तर प्रदेश के सूचना आयुक्त वीरेन्द्र सक्सेना ने बनारस में सूचना अधिकार पर आधारित एक कार्यक्रम में व्यक्त की| उन्होंने कहा कि ‘‘उत्तर प्रदेश सूचना आयोग में हरेक आयुक्त 30 से लेकर 100 अपील रोज़ाना सुनता है, लेकिन इसके बावजूद लम्बित मामलों की संख्या लगातार बढ़ती ही चली जा रही है|’’ उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ‘‘राज्य में सूचना का अधिकार कानून का इस्तेमाल करने वाले 90 प्रतिशत लोगों को राज्य सूचना आयोग में अपील दायर करनी पड़ती है| जिससे आयोग का काम लगातार बढ़ता जा रहा है|’’

अकेल उत्तर प्रदेश के सूचना आयोग की यह स्थिति नहीं है, बल्कि देश के सभी राज्यों और केन्द्रीय सूचना आयोग में भी यही हालात हैं, जहॉं पर प्रतिदिन अपीलों का अम्बार लगातार बढता ही जा रहा है| लेकिन दु:खद बात यह है कि अपीलों के इस बढते अम्बार के लिये सूचना आयोगों के आयुक्त अपील करने वाले आवेदकों को जिम्मेदार ठहराकर, असल बात से मीडिया एवं लोगों को भटकाने का प्रयास कर रहे हैं और अपनी कानूनी जिम्मेदारी से मुक्त होते हुए दिखने का प्रयास कर रहे हैं, जो अन्यायपूर्ण और अवैधानिक होने के साथ-साथ अवास्तविक स्थिति है| सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है|

सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि आखिर इन लोक सूचना अधिकारियों एवं प्रथम अपील अधिकारियों का इतना साहस कैसे बढ गया कि वे उपलब्ध एवं वांछित सूचना को आवेदकों को उपलब्ध नहीं करवा रहे हैं| जिसके कारण व्यथित होकर 90 प्रतिशत आवेदकों को सूचना आयोग के समक्ष अपील पेश करने को विवश होना पड़ रहा है| इन सबकी हिम्मत किसने बढ़ाई है? सूचना न देने वाले अधिकारियों और प्रथम अपील अधिकारियों की बदनीयत का पता लग जाने एवं जानबूझकर आवेदकों को उपलब्ध सूचना, उपलब्ध नहीं करवाने का अवैधानिक कृत्य प्रमाणित हो जाने के बाद भी उनके विरुद्ध सूचना आयोगों द्वारा जुर्माना न लगाना या नाम-मात्र का जुर्माना लगाना तथा जुर्माने की तत्काल वसूली को सुनिश्‍चित नहीं करना, क्या सूचना नहीं देने वाले अफसरों को, स्वयं सूचना आयोग द्वारा प्रोत्साहित करना नहीं है|

इसके अलावा अपील पेश करके और अपना किराया-भाड़ा खर्च करके सूचना आयोग के समक्ष उपस्थित होने वाले आवेदकों को स्वयं सूचना आयुक्तों द्वारा सार्वजनिक रूप से डांटना-डपटना क्या सूचना नहीं देने वाली ब्यूरोक्रसी को सूचना नहीं देने को प्रोत्साहित नहीं करता है? सूचना आयोग निर्धारित अधिकतम पच्चीस हजार रुपये के जुर्माने के स्थान पर मात्र दो से पॉंच हजार का जुर्माना अदा करने के आदेश करते हैं और जानबूझकर सूचना नहीं देना प्रमाणित होने के बाद भी सूचना अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय अनुशासनिक कार्यवाही के बारे में सम्बद्ध विभाग को निर्देश नहीं देते हैं|

ऐसे हालात में अगर अपीलों का अम्बार बढ रहा है तो इसके लिये केवल और केवल सूचना आयोग ही जिम्मेदार हैं| उन्हें सूचना अधिकार कानून का उपयोग करने वाले लोगों पर जिम्मेदारी डालने के बजाय, स्वयं का आत्मालोचना करना होगा और अपनी वैधानिक जिम्मेदारी का कानून के अनुसार निर्वाह करना होगा| यदि सूचना उपलब्ध होने पर भी कोई अधिकारी निर्धारित तीस दिन की अवधि में सूचना नहीं देता है, तो उस पर अधिकतम आर्थिक दण्ड अधिरोपित करने के साथ-साथ ऐसे अफसरों के विरुद्ध तत्काल अनुशासनिक कार्यवाही करके दण्ड की सूचना प्राप्त कराने के लिये भी उनके विभाग को सूचना आयोग द्वारा निर्देशित करना होगा|

यदि सूचना आयोग अफसरशाही के प्रति इस प्रकार का रुख अपनाने लगें तो एक साल के अन्दर-अन्दर दूसरी अपीलों में 90 प्रतिशत कमी लायी जा सकती है| सच्चाई तो यह भी है कि यदि सूचना का अधिकार कानून के अनुसार सभी सूचनाओं को जनता के लिये सार्वजनिक कर दिया जावे तो सूचना चाहने वालों की संख्या में भी भारी कमी लायी जा सकती है|


लेखक :
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ जयपुर से प्रकाशित हिन्दी पाक्षिक समाचार-पत्र “प्रेसपालिका” के सम्पादक, विविध विषयों के लेखक, टिप्पणीकार, चिन्तक, शोधार्थी तथा समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार, मनमानी, मिलावट, गैर-बराबरी आदि के विरुद्ध 1993 में स्थापित एवं 1994 से राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली से पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन “भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान” (बास) (BAAS) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। जिसके हजारों आजीवन कार्यकर्ता राजस्थान के सभी जिलों एवं देश के आधे से अधिक राज्यों में सेवारत हैं।
dr.purushottammeena@yahoo.in Ph. 0141-2222225 Mob. : 098285-02666
----------------------


भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) की सदस्यता प्राप्ति हेतु निर्धारित फॉर्म :




यहाँ पर (नीचे दिए लिंक पर) क्लिक करें, जिससे फॉर्म जेपीजी फोर्मेट में खुलेगा, आप इस फॉर्म को माउस पर राइट क्लिक करके अपने कंप्यूटर पर सेव करें और फिर अपने कंप्यूटर से A/4 साइज के पेपर पर प्रिंट करें! इसकी कितनी भी फोटोकॉपी करवाकर उपयोग करें| (याद रहे की फॉर्म के सभी बिन्दुओं को हिंदी एवं अंगरेजी के बड़े अक्षरों में सही-सही भरना जरूरी है, अन्यथा फॉर्म निरस्त हो सकता है! जो बिंदु लागू नहीं हो उसे खाली छोड़ दें) :-

6.11.10

आरटीआई एक्ट की अवमानना करने वालों को राजस्थान सूचना आयोग का संरक्षण!


Tuesday, May 18, 2010


आरटीआई एक्ट की अवमानना करने वालों
को राजस्थान सूचना आयोग का संरक्षण!


यहाँ उन मामलों की बात की जाये जिनमें लोक सूचना अधिकारी का पक्ष सुनने के बाद राज्य सूचना आयोग अपीलार्थी के पक्ष में निर्णय देते हैं, जिनमें सूचना उपलब्ध होने के उपरान्त भी लोक सूचना अधिकारी एवं प्रथम अपील अधिकारी द्वारा सूचना नहीं दी गयी होती है। ऐसे मामलों में धारा 20 के तहत दण्डात्मक कार्यवाही करने के बजाय, राज्य सूचना आयोग की ओर से अधिकतर मामलों में निर्णय दिया जाता है कि लोक सूचना अधिकारी द्वारा एक माह के अन्दर सूचना प्रदान कर दी जावे। इसके बाद भी अनेक मामलों में सूचना नहीं मिलती है। अनेक सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं का तो यहाँ तक कहना है कि उनकी ओर से लिखित में या मौखिक रूप से द्वितीय अपील में उठाये जाने वाले मुद्दों या तर्कों की अपील के निस्तारण के समय चर्चा तक नहीं की जाती है। बल्कि उठाये गये तर्कों की अनदेखी करके निर्णय सुनाये जाते हैं। इसे न्याय को विफल करने की प्रक्रिया के सदृश्य समझा जाना चाहिये।
------------------------------------------------------
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
------------------------------------------------------

सूचना का अधिकार अधिनियम (आरटीआई एक्ट), 2005 की धारा 20 में साफ शब्दों में लिखा है कि यदि राज्य सूचना आयोग की किसी मामले का निर्णय करते समय यह राय हो किे लोक सूचना अधिकारी ने बिना किसी युक्तियुक्त (समुचित) कारण के सूचना के लिये किसी आवेदन को प्राप्त करने से इनकार कर दिया हो या निर्धारित समय अविधि (तीस दिन) के भीतर सूचना नहीं दी हो......तो राज्य सूचना आयोग ऐसे लोक सूचना अधिकारी के विरुद्ध निर्धारित अवधि गुजर जाने के बाद प्रतिदिन 250 रुपये के हिसाब से जुर्माना अधिरोपित करेगा, लेकिन ऐसे जुर्माने की कुल राशि 25000 से अधिक नहीं होगी। इसी धारा के अन्त में यह भी उल्लेख किया गया है कि लोक सूचना अधिकारी के विरुद्ध विभागीय सेवा नियमों के तहत अनुशासनिक कार्यवाही की सिफारिश भी की जा सकेगी।

राजस्थान के सन्दर्भ में उक्त नियम का अनुपालन करवाने की कानूनी जिम्मेदारी राजस्थान सूचना आयोग की है, लेकिन राज्य के सूचना अधिकार कानून से जुडे कार्यकर्ता एवं सूचना प्राप्ति के इच्छुक लोगों का इस बात से बेहद निराशा हो रही है कि इस प्रावधान का अनुपालन करवाने के लिये राज्य सूचना आयोग बिलकुल भी संजीदा नहीं है, जो इस कानून में अपेक्षाओं के प्रतिकूल है। दूसरी ओर राज्य सूचना आयोग के समक्ष अपीलों का अम्बार लग रहा है। जिसके कारण मामलों का शीघ्रता से निस्तारण नहीं हो पा रहा है। इन दोनों हालातों के लिये सीधे तौर पर केवल राज्य सूचना आयोग स्वयं ही सम्पूर्ण रूप से जिम्मेदार हैं। इस बात को समझने के लिये सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया पर थोडा सा प्रकाश डालना जरूरी है।

एक आवेदक सूचना प्राप्त करने के लिये निर्धारित शुल्क अदा करके सम्बन्धित लोक सूचना अधिकारी के कार्यालय में आवेदन करता है। सर्व-प्रथम तो लोक सूचना अधिकारी द्वारा आवेदन प्राप्त ही नहीं किया जाता है या कई दिनों तक टरकाने के बाद आवेदन प्राप्त किया जाता है। जिनके आवेदन प्राप्त नहीं किये जाते हैं, फिलहाल उनकी पीडा को छोड दें और विवेचन के लिये केवल उन्हीं मामलों को सामने रखते हैं, जिन्हें लोक सूचना अधिकारी कार्यालय द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है। आवेदन को निर्धारित 30 दिन तक इन्तजार करता है, लेकिन 30 दिन तक कोई जवाब नहीं दिया जाता है। 31 वें दिन अपील अधिकारी को अपील प्रस्तुत की जाती है। अपील अधिकारी के लिये निर्धारित अधिकतम 45 दिन अवधि में अपीलार्थी को कोई उत्तर नहीं देता है, तब थक हारकर द्वितीय अपील राज्य सूचना आयोग को पेश की जाती है।

राज्य सूचना आयोग जरिये नोटिस 21 दिन में उत्तर देने के लिये लोक सूचना अधिकारी को निर्देश देते हैं। नोटिस में यह भी उल्लेख किया जाता है कि यदि नोटिस का जवाब नहीं दिया गया तो धारा 20 के तहत कार्यवाही की जा सकती है। इसके बावजूद भी अधिकतर मामलों में 21 दिन में इस नोटिस का कोई उत्तर नहीं दिया जाता है। राज्य सूचना आयोग इसके उपरान्त भी ऐसे अनुशासनहीन लोक सूचना अधिकारियों के विरुद्ध अपने नोटिस के अनुसार किसी प्रकार की कार्यवाही नहीं करता है और फिर से नोटिस जारी किया जाता है। कई मामलो में दो से तीन बार नोटिस जारी करने के बाद लोक सूचना अधिकारी स्वयं या अपने किसी प्रतिनिधि के माध्यम से अपना पक्ष प्रस्तुत करते हैं।

इस दौरान सूचना प्राप्त करने के इच्छुक व्यक्ति को हर बार राज्य की राजधानी जयपुर में राज्य सूचना आयोग के दफ्तर में उपस्थित होना पडता है। यहाँ उन मामलों की बात की जाये जिनमें लोक सूचना अधिकारी का पक्ष सुनने के बाद राज्य सूचना आयोग अपीलार्थी के पक्ष में निर्णय देते हैं, जिनमें सूचना उपलब्ध होने के उपरान्त भी लोक सूचना अधिकारी एवं प्रथम अपील अधिकारी द्वारा सूचना नहीं दी गयी होती है। ऐसे मामलों में धारा 20 के तहत दण्डात्मक कार्यवाही करने के बजाय, राज्य सूचना आयोग की ओर से अधिकतर मामलों में निर्णय दिया जाता है कि लोक सूचना अधिकारी द्वारा एक माह के अन्दर सूचना प्रदान कर दी जावे। इसके बाद भी अनेक मामलों में सूचना नहीं मिलती है। अनेक सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं का तो यहाँ तक कहना है कि उनकी ओर से लिखित में या मौखिक रूप से द्वितीय अपील में उठाये जाने वाले मुद्दों या तर्कों की अपील के निस्तारण के समय चर्चा तक नहीं की जाती है। बल्कि उठाये गये तर्कों की अनदेखी करके निर्णय सुनाये जाते हैं। इसे न्याय को विफल करने की प्रक्रिया के सदृश्य समझा जाना चाहिये।

इन हालातों में लोक सूचना अधिकारी और प्रथम अपील अधिकारी अधिकतर मामलों में सूचना देना तो दूर सूचना प्राप्ति के आवेदनों पर कोई कार्यवाही करना ही जरूरी नहीं समझते हैं और राज्य सूचना आयोग की कोई परवाह नहीं करते हैं। परिणामस्वरूप सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत आम व्यक्ति को सूचना मिलना असम्भव हो गया है। इस कानून के तहत हर मामले में राज्य सूचना आयोग के समक्ष द्वितीय अपीलों का अम्बार लग रहा है और ऐसे में अधिक सूचना आयुक्तों के पदों के सृजन की मांग की जा रही है। जबकि यदि प्रत्येक मामले में राज्य सूचना आयोग धारा 20 के अनुसार दण्डात्मक कार्यवाही करने की इच्छाशक्ति दिखाने के अपने कानूनी कर्त्तव्य का निर्वाह करें तो अधिकतर मामलों में लोक सूचना अधिकारी कार्यालय से ही सूचना मिल जायेगी और मुश्किल से दस प्रतिशत मामलों में ही राज्य सूचना आयोग के समक्ष अपील पेश होंगी और जो होंगी उनमें अधिक गुणात्मक व त्वरित निर्णय होंगे।

इस प्रकार राज्य सूचना आयोग स्वयं ही सूचना का अधिकार अधिनियम की अवमानना करने वाले लोक सूचना अधिकारियों को दण्डित करने के स्थान पर, संरक्षण प्रदान कर रहा है। ऐसे में सूचना प्राप्त करने वालों का जमकर शोषण एवं अपमान हो रहा है और सूचना अधिकार कानून का मजाक उडाया जा रहा है। सरकारें तो चाहती ही नहीं कि सूचनाएँ मिलें, क्योंकि सूचना मिलेंगी तो काले कारनामें रुकेंगे और यदि काले कारनामें रुकेंगे तो काली कमाई कैसे होगी और यदि काली कमाई नहीं होगी तो भ्रष्ट अधिकारियों के एश-ओ-आराम के साधन एवं राजनेताओं के चुनाव खर्च के लिये अपार सम्पदा का अर्जन कैसे होगा?

इन लोगों के गैर-कानूनी कार्यों को दबे रहने देने में राजस्थान सूचना आयोग का समर्थन घोर चिन्ता एवं दुःख का विषय है। इस पर जनता और गैर-सरकारी संगठन ही लगाम लगा सकते हैं या सूचना अधिकार के प्रति दिल्ली हाई कोर्ट जैसी सच्ची श्रृद्धा प्रदर्शित करने वाले न्यायिक निर्णय सूचना आयोग को ठीक कर सकते हैं। कुछ न कुछ तो कदम उठाने ही होंगे। अन्यथा आजादी के बाद पहली बार मिले इस वास्तविक लोकतान्त्रिक अधिकार को भ्रष्ट एवं मनमानी की आदी अफसरशाही पूरी तरह से मृत घोषित कर देगी।