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5.4.12

पुलिस बनाम जनता


डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

यह सबसे बुरी और गलत बात है कि अधिक मुकदमे दर्ज होने का कारण आला पुलिस अधिकारियों द्वारा थानाधिकारी से पूछा जाता है। जबकि इसके विपरीत होना तो यह चाहिये कि जिस थाने में अधिक मुकदमे दर्ज हुए हों, उस थाने को जनता के प्रति अधिक संवेदनशीलता का प्रमाण-पत्र दिया जाना चाहिये। आखिर अपराधियों से आहत जनता का कानूनी तौर पर उपचार प्रदान करने का काम करने के लिये ही तो पुलिस थानों की स्थापना की गयी है। जिन्हें अधिकतम कानूनी उपचार प्रदान करने के लिये, सवालों के घेरे में खड़ा करना किसी भी सूरत में न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। क्या कभी किसी उच्चतम स्तर के चिकित्सा अधिकारी ने नीचे के स्तर के चिकित्सक से यह सवाल किया है कि उसके द्वारा अधिक संख्या में बीमारों का उपचार क्यों किया गया? यदि नहीं तो पुलिस थाने से भी यह नहीं पूछा जाना चाहिये कि उसने अधिक फरियादियों की फरियाद दर्ज क्यों की? क्योंकि पुलिस भी तो आहत व्यक्ति को कानूनी उपचार प्रदान करती है। कानूनी उपचार भी जीवन के लिये उतना ही जरूरी है, जितना कि चिकित्सक द्वारा प्रदान किया जाने वाला शारीरिक या मानसिक उपचार।

13.12.11

कैसा हो लोकपाल कानून?

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि इस देश की रग-रग में भ्रष्टाचार समाया हुआ है और भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिये अन्य अनेक बातों के साथ-साथ सख्त कानून की दरकार है, जिसके लिये प्रस्तावित लोकपाल कानून को जरूरी बताया जा रहा है| अब तक की सभी केन्द्र सरकारों द्वारा किसी न किसी बहाने लोकपाल कानून को लटकाकर रखा है, जिसमें कॉंग्रेस भी शामिल है| चूँकि कॉंग्रेस ने सर्वाधिक समय तक देश पर शासन किया है, इस कारण कॉंग्रेस भ्रष्टाचार को पनपाने, रोकथाम नहीं कर पाने और भ्रष्टाचार निरोधक कानूनों का क्रियान्वयन नहीं करवा पाने और, या लोकपाल कानून को नहीं बनवा पाने के लिये सर्वाधिक जिम्मेदार है| जिससे वह बच नहीं सकती है| यह अलग बात है कि केन्द्र की वर्तमान यूपीए सरकार लोकपाल कानून के बारे में बुरी तरह से फंस चुकी है| जानकारों का मानना है कि केन्द्र सरकार इस बारे में अन्ना हजारे और अन्ना हजारे के पीछे  खड़े राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) को इस बात का श्रेय नहीं लेने देना चाहती कि उनके दबाव में लोकपाल कानून बनाया गया है| क्योंकि राजनीति में इस प्रकार के निर्णयों का चुनावों में असर होता है| लेकिन आम जनता को इस बात से क्या लेना देना है? कॉंग्रेस या यूपीए ने ऐसी स्थिति क्यों निर्मित होने दी कि अन्ना, आरएसएस या भाजपा या एनडीए या अन्य विपक्षी दलों को लोकपाल कानून बनवाने का श्रेय मिलने की स्थिति बनी! निश्‍चय ही यह वर्तमान यूपीए और कॉंग्रेस नेतृत्व की राजनैतिक असफलता है| जिसका फायदा दूसरे राजनैतिक उठाना चाहते हैं, तो उनका राजनैतिक अधिकार है| इसमें गलत भी क्या है? अब भी यदि कॉंग्रेस दुविधा से बाहर नहीं निकल पायी तो फिर उसे और यूपीए को होने वाले नुकसान की लम्बे समय तक भरपाई कर पाना सम्भव नहीं होगा| अत: बेहतर यही होगा कि केन्द्र सरकार न मात्र लोकपाल कानून को लाये ही, बल्कि सच्चे अर्थों में लोकपाल कानून बनाकर संसद में पेश करे| जिससे देश और देश की जनता को भ्रष्टाचार, अनाचार और गैर-कानूनी कुकृत्यों से मुक्ति मिल सके|

वर्तमान में इस बात की बहस भी चल रही है कि लोकपाल के दायरे में कौन हो और कौन नहीं हो| निश्‍चय ही यह महत्वपूर्ण और विचारणीय मुद्दा है| जिस पर राष्ट्रीय सोच और राष्ट्रहित के साथ-साथ देश के सभी वर्गों का विशेषकर कमजोर वर्गों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है| अत: प्रस्तावित लोकपाल कानून बनाते समय ध्यान रखा जावे कि-

1. बिना किसी किन्तु-परन्तु के देश का प्रत्येक लोक सेवक लोकपाल के दायरे में आना चाहिये| लोक सेवक के दायरे में छोटे से छोटे जनप्रतिनिधि से लेकर प्रधानमन्त्री और राष्ट्रपति तक हर एक उस व्यक्ति को आना चाहिये जो जनता से संग्रहित धन से वेतन लेता हो या जनता से संग्रहित धन को खर्चे करने के बारे में निर्णय लेने का कानूनी या संवैधानिक अधिकार रखता हो| जिसमें न्यायपालिका और सेना भी शामिल हों|

2. सभी औद्योगिक घराने, गैर-सरकारी संगठन (चाहे सरकारी अनुदान लेते हों या नहीं), सभी गैर-सरकारी शिक्षण या अन्य संस्थान, खेल संघ और ऐसा प्रत्येक सरकारी या गैर सरकारी या निजी निकाय या उपक्रम जिसके पास जनता से किसी भी कारण से किसी भी रूप में धन संग्रहित करने और उसे खर्च करने का हक हो उसे बिना किसी भी किन्तु-परन्तु के प्रस्तावित लोकपाल कानून के दायरे में होना ही चाहिये|

3. सभी प्रकार की ऐसी जॉंच ऐजेंसियॉं, जिन्हें किसी भी प्रकार के मामले की जॉंच करने का हक हो उन्हें भी प्रस्तावित लोकपाल कानून के दायरे में होना चाहिये| जिनमें नीचे से ऊपर तक सभी लोक सेवकों की नियुक्ति, पदोन्नति और बर्खास्तगी का अधिकार केवल लोकपाल के पास ही होना चाहिये|

4. प्रस्तावित लोकपाल कानून में भ्रष्टाचार की परिभाषा को विस्तिृत और सुस्पष्ट करने की जरूरत है| जिसमें प्रत्येक ऐसे गैर-कानूनी कृत्य को जिसमें धन, बजट, अनुदान, शुल्क बजट,विज्ञापन, कर आदि को किसी भी प्रकार से धन समावेश हो वह मामला भ्रष्टाचार से सम्बन्धित होने के कारण प्रस्तावित लोकपाल कानून के दायरे में आना चाहिये| इसके अन्तर्गत समस्त प्रकार का मीडिया, बजट का मनमाना और गैर-कानूनी उपयोग करने वाले लोक सेवकों को शामिल किया जाना बेहद जरूरी है| इससे मीडिया की मनमानी और ब्यूराक्रेसी की भेदभावपूर्ण कुनीतियों पर भी अंकुश लग सकेगा|

5. प्रस्तावित लोकपाल कानून में यह स्पष्ट रूप से व्यवस्था होनी चाहिये कि इसमें देश के सभी सम्प्रदायों और वर्गों को बारी-बारी से अवसर मिलेंगे| इसमें कम से कम 50 फीसदी स्त्रियों सहित, अल्पसंख्यकों, पिछड़ा वर्ग और दलित-आदिवासी वर्गों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सशक्त हिस्सेदारी देने की सुनिश्‍चित व्यवस्था भी होनी चाहिये|

6. लोकपाल की औपचारिक नियुक्ति बेशक राष्ट्रपति द्वारा की जावे, लेकिन लोकपाल के चयन का अधिकार किसी भी राजनेता और पूर्व ब्यूरोक्रेट के पास नहीं होना चाहिये| बल्कि लोकपाल का चयन करने के लिये देश के निष्पक्ष कानूनविदों, न्यायविदों और सामाज के निष्पक्ष लोगों के संवैधानिक चयन मण्डल द्वारा होना चाहिये| बाद के चयनों में सेवा निवृत लोकपालों को भी शामिल किया जा सकता है|

7. लोकपाल को हटाने के लिये एक संवैधानिक निकाय होना चाहिये, जिसमें एक भी ऐसा व्यक्ति शामिल नहीं हो, जो लोकपाल के चयन मण्डल में भागीदार रहा हो| लोकपाल के अधीन सभी लोक सेवकों के विरुद्ध देश के हर एक व्यक्ति को कानूनी कार्यवाही प्रारम्भ कराने के लिये न्यायपालिका के समक्ष अर्जी देने का पूर्ण हक दिया जावे|

6.11.11

धार्मिकता के मापदंड स्वयं भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करते हैं!

मुद्दा: कानून से ज्यादा नैतिक निर्माण की जरूरत
धीरे-धीरे एक आम भावना घर करती जा रही है कि हर समस्या का हल कानून बनाकर किया जा सकता है। अन्ना हजारे और उनके सहयोगी भ्रष्टाचार को रोकने या खत्म करने के लिए एक मजबूत कानून पारित कराना

19.7.11

विभागीय जॉंच रूपी अभेद्य सुरक्षा कवच को भेदना होगा!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
Dr. Purushottam Meena 'Nirankush
सम्पादक-प्रेसपालिका (पाक्षिक)
Jaipur (Raj.) 98285-02666
इन दिनों देशभर में लोकपाल कानून को बनाये जाने और लोकपाल के दायरे में ऊपर से नीचे तक के  सभी स्तर के लोक सेवकों को लाने की बात पर लगातार चर्चा एवं बहस हो रही है| सरकार निचले स्तर के लोक सेवकों को लोकपाल की जॉंच के दायरे से मुक्त रखना चाहती है, जबकि सिविल सोसायटी के प्रतिनिधि सभी लोक सेवकों को लोकपाल के दायरे में लाना चाहते हैं| ऐसे में लोक सेवकों को वर्तमान में दण्डित करने की व्यवस्था के बारे में भी विचार करने की जरूरत है| इस बात को आम लोगों को समझने की जरूरत है कि लोक सेवकों को अपराध करने पर सजा क्यों नहीं मिलती है|

लोक सेवकों को सजा नहीं मिलना और लोक अर्थात् आम लोगों को लगातार उत्पीड़ित होते रहना दो विरोधी और असंवैधानिक बातें हैं| नौकर मजे कर रहे हैं और नौकरों की मालिक आम जनता अत्याचार झेलने को विवश है| आम व्यक्ति से भूलवश जरा सी भी चूक हो जाये तो कानून के कथित रखवाले ऐसे व्यक्ति को हवालात एवं जेल के सींखचों में बन्द कर देते हैं| जबकि आम जनता की रक्षा करने के लिये तैनात और आम जनता के नौकर अर्थात् लोक सेवक यदि कानून की रक्षा करने के बजाय, स्वयं ही कानून का मखौल उड़ाते पकडे़ जायें तो भी उनके साथ कानूनी कठोरता बरतना तो दूर किसी भी प्रकार की दण्डिक कार्यवाही नहीं की जाती! आखिर क्यों? क्या केवल इसलिये कि लोक सेवक आम जनता नहीं है या लोक सेवक बनने के बाद वे भारत के नागरिक नहीं रह जाते हैं? अन्यथा क्या कारण हो सकता है कि भारत के संविधान के भाग-३, अनुच्छेद १४ में इस बात की सुस्पष्ट व्यवस्था के होते हुए कि कानून के समक्ष सभी लोगों को समान समझा जायेगा और सभी को कानून का समान संरक्षण भी प्राप्त होगा, भारत का दाण्डिक कानून लोक सेवकों के प्रति चुप्पी साध लेता है?

पिछले दिनों राजस्थान के कुछ आईएएस अफसरों ने सरकारी खजाने से अपने आवास की बिजली का बिल जमा करके सरकारी खजाने का न मात्र दुरुपयोग किया बल्कि सरकारी धन जो उनके पास अमनत के रूप में संरक्षित था उस अमानत की खयानत करके भारतीय दण्ड संहिता की धारा 409 के तहत वर्णित आपराधिक न्यासभंग का अपराध किया, लेकिन उनको गिरफ्तार करके जेल में डालना तो दूर अभी तक किसी के भी विरुद्ध एफआईआर तक दर्ज करवाने की जानकारी समाने नहीं आयी है| और ऐसे गम्भीर मामले में भी जॉंच की जा रही है, कह कर इस मामले को दबाया जा रहा है| हम देख सकते हैं कि जब कभी लोक सेवक घोर लापरवाही करते हुए और भ्रष्टाचार या नाइंसाफी करते हुए पाये जावें तो उनके विरुद्ध आम व्यक्ति की भांति कठोर कानूनी कार्यवाही होने के बजाय, विभागीय जॉंच की आड़ में दिखावे के लिये स्थानान्तरण या ज्यादा से ज्यादा निलम्बन की कार्यवाही ही की जाती है| यह सब जानते-समझते हुए भी आम जनता तथा जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि चुपचाप यह तमाशा देखते रहते हैं| जबकि कानून के अनुसार लोक सेवकों के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही के साथ-साथ भारतीय आपराधिक कानूनों के तहत दौहरी दण्डात्मक कार्यवाही किये जाने की व्यवस्था है|

IAS OFFICERS
इस प्रकार की घटनाओं में पहली नजर में ही आईएएस अफसर उनके घरेलु बिजली उपभोग के बिलों का सरकारी खजाने से भुगतान करवाने में सहयोग करने वाल या चुप रहने वाले उनके साथी या उनके अधीनस्थ भी बराबर के अपराधी हैं| जिन्हें वर्तमान में जेल में ही होना चाहिये, लेकिन सभी मजे से सरकारी नौकरी कर रहे हैं| ऐसे में विचारणीय मसला यह है कि जब आईएएस अफसर ने कलेक्टर के पद पर रहेतु अपने दायित्वों के प्रति न मात्र लापरवाही बरती है, बल्कि घोर अपराध किया है तो एसे अपराधियों के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता एवं भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत तत्काल सख्त कानूनी कार्यवाही क्यों नहीं की जा रही है? नीचे से ऊपर तक सभी लोक सेवकों के मामलों में ऐसी ही नीति लगातार जारी है| जिससे अपराधी लोक सेवकों के होंसले बुलन्द हैं!

इन हालातों में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकारी सेवा में आने से कोई भी व्यक्ति महामानव बन जाता है? जिसे कानून का मखौल उड़ाने का और अपराध करने का ‘विभागीय जॉंच’ रूपी अभेद्य सुरक्षा कवच मिला हुआ है| जिसकी आड़ में वह कितना ही गम्भीर और बड़ा अपराध करके भी सजा से बच निकलता है| जरूरी है, इस असंवैधानिक और मनमानी व्यवस्था को जितना जल्दी सम्भव हो समाप्त किया जावे| इस स्थिति को सरकारी सेवा में मेवा लूटने वालों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता| क्योंकि सभी चोर-चोर मौसेरे भाई होते हैं, जो हमेशा अन्दर ही अन्दर एक-दूसरे को बचाने में जुटे रहते हैं| आम जनता को ही इस दिशा में कदम उठाने होंगे| इस दिशा में कदम उठाना मुश्किल जरूर है, लेकिन असम्भव नहीं है| क्योंकि विभागीय जॉंच कानून में भी इस बात की व्यवस्था है कि लोक सेवकों के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही के साथ-साथ आपराधिक मुकदमे दायर कर आम व्यक्ति की तरह लोक सेवकों के विरुद्ध भी कानूनी कार्यवाही की जावे| जिसे व्यवहार में ताक पर उठा कर रख दिया गया लगता है|

अब समय आ गया है, जबकि इस प्रावधान को भी आम लोगों को ही क्रियान्वित कराना होगा| अभी तक पुलिस एवं प्रशासन कानून का डण्डा हाथ में लिये अपने पद एवं वर्दी का खौफ दिखाकर हम लोगों को डराता रहा है, लेकिन अब समय आ गया है, जबकि हम आम लोग कानून की ताकत अपने हाथ में लें और विभागीय जॉंच की आड़ में बच निकलने वालों के विरुद्ध आपराधिक मुकदमे दर्ज करावें| जिससे कि उन्हें भी आम जनता की भांति कारावास की तन्हा जिन्दगी का अनुभव प्राप्त करने का सुअवसर प्राप्त हो सके और जिससे आगे से लोक सेवक, आम व्यक्ति को उत्पीड़ित करने तथा कानून का मखौल उड़ाने से पूर्व दस बार सोचने को विवश हों|
लेखक : सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित और अठारह राज्यों में प्रसारित हिन्दी पाक्षिक)  तथा राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
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अन्य अनेक साईट्स के आलावा मेरा उक्त लेख प्रवक्ता डोट कॉम पर भी प्रकाशित हुआ है| जिसका लिंक नीचे प्रस्तुत है :


http://www.pravakta.com/story/27274


उक्त लिंक पर एक पाठक श्री अनिल गुप्ता जी ने निम्न टिप्पणी की :
Anil Gupta,Meerut,India

लोकसेवकों को गुनाह करने पर सजा अवश्य मिलनी चाहिए. लेकिन अनेक बार ये देखा गया है की भ्रष्ट लोकसेवक साफ़ बच जाते हैं क्योंकि उनसे कोई नाराज़ नहीं होता जबकि ईमानदारी से काम करने वाले मारे जाते हैं क्योंकि ईमानदारी से काम करने के कारण अनेक लोग उनसे नाराज़ होकर फर्जी शिकायतें कर देते हैं और छोटी मोती तकनिकी कमियों का आधार लेकर उन्हें भरी सजा मिल जाती है. ऐसे मामलों में क्या होना चाहिए?


उपरोक्त टिप्पणी के प्रतिउत्तर में मेरी और से लिखी गयी टिप्पणी नीचे प्रस्तुत है : 




श्री अनिल गुप्ता जी,
 सबसे पहले तो इस आलेख पर टिप्पणी लिखने के लिए आभार और धन्यवाद| अन्यथा कुछ पाठकों को तो इस प्रकार के विषय टिप्पणी करने के लिए उपयुक्त ही नहीं लगते, क्योंकि इस प्रकार के विषय शान्त समाज में वैमनस्यता फ़ैलाने में सहायक नहीं होते हैं| ऐसे में आपकी टिप्पणी न मात्र स्वागत योग्य और सराहनीय है, बल्कि मेरे लिये विचारणीय भी है|
आपने महत्वपूर्ण सवाल उठाया है कि-‘‘लोकसेवकों को गुनाह करने पर सजा अवश्य मिलनी चाहिए. लेकिन अनेक बार ये देखा गया है की भ्रष्ट लोकसेवक साफ़ बच जाते हैं क्योंकि उनसे कोई नाराज़ नहीं होता जबकि ईमानदारी से काम करने वाले मारे जाते हैं क्योंकि ईमानदारी से काम करने के कारण अनेक लोग उनसे नाराज़ होकर फर्जी शिकायतें कर देते हैं और छोटी मोती तकनिकी कमियों का आधार लेकर उन्हें भरी सजा मिल जाती है. ऐसे मामलों में क्या होना चाहिए?’’
श्री अनिल गुप्ता जी, आपकी बात सही है और व्यवहार में कुछ ईमानदार लोक सेवकों के साथ ऐसा होता भी है| लेकिन मैं स्वयं करीब इक्कीस वर्ष तक भारत सरकार की सेवा में लोक सेवक रहा हूँ और मुझे कभी इस समस्या का सामना नहीं करना पड़ा| इसका कारण ये भी रहा कि मेरा पब्लिक से सीधा डीलिंग नहीं था| लेकिन मैंने ऐसी शिकायतें करते हुए अनेक लोक सेवक देखें हैं, जो पूरी तरह से ईमानदार रहे हैं| मैं कोई ऑथोरिटी तो हूँ नहीं, लेकिन फिर भी अपने अनुभवों के आधार पर कुछ बातें इस बारे में सार्वजनिक करना चाहता हूँ :-
-यह बात सही है कि कुछ लोक सेवक सच्चे और ईमानदार होते हैं, लेकिन उनमें से अनेक अपने कार्य के प्रति निष्ठावान नहीं होते और वे अपनी ईमानदारी को अपने अहंकार से जोड़ लेते हैं| इस कारण वे बाहरी और विभागीय लोगों में अप्रिय हो जाते हैं| ऐसे में यही माना जाता है कि ‘‘एक तो करेला और ऊपर से नीम चढ़ा!’’ अर्थात् ईमादार और अहंकारी ये दो बातें आज के भ्रष्ट और पददलित सरकारी महकमें में सम्भव नहीं| वैसे तो प्रत्येक लोक सेवक को ईमानदार एवं नम्र होना चाहिए, लेकिन ईमानदार लोक सेवक को अवश्य ही नम्र होना चाहिए, ये हर एक ईमानदार लोक सेवक के लिए बहुत जरूरी योग्यता है|
-कुछ ईमानदार लोक सेवक ऐसे होते हैं, जो केवल अपनी ईमानदारी का ढोल पीटते रहते हैं और कुछ न कुछ बहाने बनाकर या नुक्ताचीनी करके काम को टालते रहते हैं| नियमों का हवाला देकर काम नहीं करते हैं|
-कुछ ईमानदार लोक सेवक इस कारण से ईमानदार होते हैं क्योंकि वे रिश्वत चाहते तो हैं, लेकिन उन्हें कोई देता नहीं या उनमें रिश्वत लेने की हिम्मत या कूबत नहीं होती और इस कारण से वे जनता के काम करने के बजाय, जैसा कि आपने लिखा है, तकनीकी कारणों से बहाना बनाकर काम को टालते रहते हैं| ऐसे लोगों को हमेशा परेशानी झेलनी पड़ती हैं|
-उपरोक्त के आलावा ये बात भी सही है कि आजकल भ्रष्ट लोक सेवकों की संख्या अधिक होने के कारण, नियमों के बहाने या तकनीकी कारणों से काम समय पर नहीं करने वाले लोक सेवकों को संदेह की नज़र से देखा जाता है और ऐसे लोक सेवकों की शिकायत भी कर दी जाती है| शिकायत मिलने पर अधिकतर भ्रष्ट हो चुके अफसर ऐसे ईमानदार जीवों के विरुद्ध तत्काल कठोर कार्यवाही करते हैं और ऐसे ईमानदार लोक सेवक को सजा मिलने की सम्भावना हमेशा बनी रहती है|
शायद आपने यही पूछा है कि ऐसे में क्या किया जाये?
मैं कोई विशेषज्ञ तो हूँ नहीं, लेकिन जो कुछ देखा, सुना, पढ़ा, अनुभव किया और आत्मसात किया है, उसके आधार पर अपने विचार बतला सकता हूँ :-
१-एक महत्वपूर्ण बात ये है कि हमारे देश का इतिहास साक्षी है कि जिस काल को राम राज्य कहा जाता है, उसमें भी पतिव्रता सीता की अग्नी-परीक्षा ली गयी थी! अर्थात सच्चे और अच्छे लोगों को सदैव अपनी अच्छाई और सच्ची बातों को (जो आम तौर पर कड़वी होती हैं) सिद्ध करने में सक्षम और समर्थ होना चाहिए| आज के समय में चोर, चालक और भ्रष्ट लोगों के पास पद और धन की शक्ति होती है, जिसका वे उन लोगों के खिलाफ भी जमकर उपयोग करते हैं, जो उनके विधि विरुद्ध कार्यों में रोड़ा बनते हैं! चाहे ऐसे लोग विभागीय लोक सेवक हों या आम जनता या जनप्रतिनिधि! आज हर एक सरकारी संस्थान में ऐसे ही लोगों का कब्ज़ा है| जिसके कारणों पर विवेचना करने पर विषय लम्बा हो जायेगा|
२-दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि आज की व्यवस्था में लोक सेवक का ईमानदार होना अपराध जैसा है और यदि लोक सेवक छोटे पद पर है और फिर भी वो ईमानदार है तो उसको हर दिन परीक्षा देनी पड़ती है| इसके उपरांत भी अनेक लोक सेवक आज भी ईमानदार हैं! मुझे भी कॉलेज के समय से ही सही, सच्ची और नियम संगत बात कहने की आदत रही है| जिसे सरकारी सेवा में (और यहॉं प्रवक्ता के पाठकों की नज़र में भी) बीमारी समझा जाता है| इसकी मैंने खूब कीमत चुकाई है| हमले सहे हैं, जेल की यात्रा भी करनी पड़ी हैं| लेकिन अंतत: अभी तक मैं जिन्दा हूँ और अपने परिवार की गाड़ी को संचालित कर रहा हूँ| मैंने तो ये सीखा है कि यदि निजी जीवन में या सरकारी सेवा में सच्चा और ईमानदार रहना है तो कुछ बातें अपने जीवन में अपनानी होंगी|
जैसे एक ईमानदार और सच्चे लोक सेवक के लिये निम्न बातें महत्वपूर्ण हैं :-
-हमेशा और हर हाल में बोलने और लिखने में संसदीय और कार्यालयी भाषा का ही उपयोग करें|
-यदि ईश्वर में आस्था हो तो ईश्वर में पूर्ण आस्था रखें|
-अपने कार्य में अधिकाधिक निपुणता हासिल करें|
-अपनी बात निर्भीकता पूर्वक कहने में हिचकें नहीं|
-अपने कार्य को केवल ईमानदारी से ही नहीं करें, बल्कि समय पर और श्रद्धापूर्वक पूर्वक भी करें|
-यदि आपके दायित्व और अधिकार संहिताबद्ध नहीं हैं तो अपना पद संभालते ही अपने बॉस या विभागाध्यक्ष से अपने समस्त अधिकार और दायित्वों की स्पष्ट और पूर्ण जानकारी लिखित में प्राप्त करें| और उसका निष्ठापूर्वक निर्वाह करें|
-जीवन में तनाव आते हैं और कई बार परिवार की कई अप्रिय स्थितियों के कारण मन अप्रसन्न या विषादमय रहता तो ऐसे समय में अपनी मनस्थिति का उल्लेख करते हुए अवकाश स्वीकृत करवा लें| जिससे ऐसे हालात में सरकारी काम में किसी प्रकार की गलती नहीं हो| इसके बावजूद भी जब भी आपसे जाने-अनजाने कोई गलती या भूल हो जाये तो उसके बारे में सभी कारणों तथा उन परिस्थितियों को दर्शाते हुए, जिनके कारण ऐसा हुआ अपने बॉस को लिखित में अवगत करा दें|
-कभी भी किसी के दबाव या प्रभाव या बहकावे में आकर अपनी गलती को लिखित में स्वीकार नहीं करें|
-अपने कार्य को कभी भी लंबित नहीं रहने दें| अन्यथा केवल ये ही वजह आपको नौकरी से बर्खास्त करने का कारण बन सकती है|
-अधिकाधिक समय अपने कार्यस्थल पर बैठकर काम को निपटाने की आदत डालें| काम नहीं होने पर पुराने मामलों की फाइलों का अध्ययन करें| इससे आपका काम तो समय पर होता ही है| साथ ही साथ काम में पारंगतता भी स्वत: ही आती है|
-ईमानदार लोक सेवकों को भ्रष्ट उच्च अधिकारी या वरिष्ठ साथी समान्यत: सही और कानून सम्मत परामर्श नहीं देते हैं| इसलिए यह बात याद रखनी चाहिये कि जो भी परामर्श या मार्गदर्शन किसी भी लोक सेवक को जब-जब भी जरूरी हो, उसके बारे में मार्गदर्शन देना या सिखाना या बतलाना प्रत्येक सम्बन्धित उच्च अधिकारी या वरिष्ठ साथी का कानूनी दायित्व होता है| जिसे वे टालते हैं| अत: जब भी किसी उच्च अधिकारी या वरिष्ठ साथी से परामर्श चाहिए तो ऐसा परामर्श पत्रावली पर लिखकर प्राप्त करें| ऐसे में वरिष्ठ अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते और कभी भी किसी के अस्पष्ट या समस्या पैदा कर सकने वाले मौखिक आदेशों तथा कानून विरुद्ध आदेशों का पालन नहीं करें| यदि जनहित में मौखिक आदेशों का पालन करना जरूरी हो तो कार्य पूर्ण करते ही तत्काल ऐसे मौखिक आदेशों को फ़ाइल पर लिखकर उनका सम्बन्धित अधिकारी से लिखित में अनुमोदन प्राप्त कर लें| अनुमोदन करने से इनकार करने पर एक स्तर उच्च अधिकारी को लिखित में अवगत करावें|
-अपने से वरिष्ठ या अपने बॉस के कहने से फाईल पर गलत टिप्पणी (नोटिंग) कभी नहीं लिखें| जब तक मांगी न जाये या आपके दायित्वों में शामिल नहीं हो तब तक फाईल पर अपने बॉस को परामर्श नहीं दें|
-अपने विभाग के नियमों की सामान्य नहीं, बल्कि पूर्ण जानकारी प्राप्त करें|
-विभागीय नियम केवल प्रक्रियागत नियम होते हैं, जो कार्यसंचालन के लिये बनाये जाते हैं| जिनमें अनेक ऐसे नियम भी होते हैं, जो असंगत और मनमाने होते हैं| अत: ऐसे नियमों को अन्तिम सत्य कभी नहीं मानें| आप देश के संविधान और अदालती निर्णयों के बारे में भी कुछ जानकारी रखें| जिससे आपको ज्ञात हो सके कि प्रक्रियागत नियम कितने अधिकृत हैं! यह इसलिये भी जरूरी है कि हमारे देश में बहुत सारे कानून संविधान के प्रावधानों के विपरीत होने के कारण असंवैधानिक और विधि-विरुद्ध हैं| अनेक तो ऐसे नियम भी लागू किये जा रहे हैं, जिन्हें न्यायालयों द्वारा असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है| ऐसे कानूनों का विधिक प्रभाव शून्य है|
 श्री अनिल जी मैं समझता हूँ कि आपको अपने सवाल का उत्तर मिल गया होगा| फिर भी अन्य पाठकों से भी अपेक्षा है कि वे भी इस बारे में प्रकाश डालें|
शुभाकांक्षी
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

17.11.10

रुक सकता है 90 फीसदी भ्रष्टाचार!


भ्रष्टाचार से केवल सीधे तौर पर आहत लोग ही परेशान हों ऐसा नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार वो सांप है जो उसे पालने वालों को भी नहीं पहचानता। भ्र्रष्टाचार रूपी काला नाग कब किसको डस ले, इसका कोई भी अनुमान नहीं लगा सकता! भ्रष्टाचार हर एक व्यक्ति के जीवन के लिये खतरा है। अत: हर व्यक्ति को इसे आज नहीं तो कल रोकने के लिये आगे आना ही होगा, तो फिर इसकी शुरुआत आज ही क्यों न की जाये?
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इस बात में तनिक भी सन्देह नहीं कि यदि केन्द्र एवं राज्य सरकारें चाहें तो देश में व्याप्त 90 फीसदी भ्रष्टाचार स्वत: रुक सकता है! मैं फिर से दौहरा दूँ कि "हाँ यदि सरकारें चाहें तो देश में व्याप्त 90 फीसदी भ्रष्टाचार स्वत: रुक सकता है!" शेष 10 फीसदी भ्रष्टाचार के लिये दोषी लोगों को कठोर सजा के जरिये ठीक किया जा सकता है। इस प्रकार देश की सबसे बडी समस्याओं में से एक भ्रष्टाचार से निजात पायी जा सकती है।

मेरी उपरोक्त बात पढकर अनेक पाठकों को लगेगा कि यदि ऐसा होता तो भ्रष्टाचार कभी का रुक गया होता। इसलिये मैं फिर से जोर देकर कहना चाहता हूँ कि "हाँ यदि सरकारें चाहती तो अवश्य ही रुक गया होता, लेकिन असल समस्या यही है कि सरकारें चाहती ही नहीं!" सरकारें ऐसा चाहेंगी भी क्यों? विशेषकर तब, जबकि लोकतन्त्र के विकृत हो चुके भारतीय लोकतन्त्र के संसदीय स्वरूप में सरकारों के निर्माण की आधारशिला ही काले धन एवं भ्रष्टाचार से रखी जाती रही हैं। अर्थात् हम सभी जानते हैं कि सभी दलों द्वारा काले धन एवं भ्रष्टाचार के जरिये अर्जित धन से ही तो लोकतान्त्रिक चुनाव ल‹डे और जीते जाते हैं।

स्वयं मतदाता भी तो भ्रष्ट लोगों को वोट देने आगे रहता है, जिसका प्रमाण है-अनेक भ्रष्ट राजनेताओं के साथ-साथ अनेक पूर्व भ्रष्ट अफसरों को भी चुनावों में भारी बहुमत से जिताना, जबकि सभी जानते हैं की अधिकतर अफसर जीवनभर भ्रष्टाचार की गंगा में डुबकी लगाते रहते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद ये ही अफसर हमारे जनप्रतिनिधि बनते जा रहे हैं। मैं ऐसे अनेक अफसरों के बारे में जानता हूँ जो 10 साल की नौकरी होते-होते एमपी-एमएलए बनने का ख्वाब देखना शुरू कर चुके हैं। साफ़ और सीधी सी बात है-कि ये चुनाव को जीतने लिये, शुरू से ही काला धन इकत्रित करना शुरू कर चुके हैं, जो भ्रष्टाचार के जरिये ही कमाया जा रहा है। फिर भी मतदाता इन्हें ही जितायेगा।

ऐसे हालत में सरकारें बिना किसी कारण के ये कैसे चाहेंगी कि भ्रष्टाचार रुके, विशेषकर तब; जबकि हम सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार, जो सभी राजनैतिक दलों की ऑक्सीजन है। यदि सरकारों द्वारा भ्रष्टाचार को ही समाप्त कर दिया गया तो इन राजनैतिक दलों का तो अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा! परिणाम सामने है : भ्रष्टाचार देशभर में हर क्षेत्र में बेलगाम दौ‹ड रहा है और केवल इतना ही नहीं, बल्कि हम में से अधिकतर लोग इस अंधी दौ‹ड में शामिल होने को बेताब हैं।

‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनाया जावे।

अधिकतर लोगों के भ्रष्टाचार की दौ‹ड में शामिल होने की कोशिशों के बावजूद भी उन लोगों को निराश होने की जरूरत नहीं है, जो की भ्रष्टाचार के खिलाफ काम कर रहे हैं या जो भ्रष्टाचार को ठीक नहीं समझते हैं। क्योंकि आम जनता के दबाव में यदि सरकार ‘‘सूचना का अधिकार कानून" बना सकती है, जिसमें सरकार की 90 प्रतिशत से अधिक फाइलों को जनता देख सकती है, तो ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनाना क्यों असम्भव है? यद्यपि यह सही है कि ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बन जाने मात्र से ही अपने आप किसी प्रकार का जादू तो नहीं हो जाने वाला है, लेकिन ये बात तय है कि यदि ये कानून बन गया तो भ्रष्टाचार को रुकना ही होगा।
‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनवाने के लिए उन लोगों को आगे आना होगा जो-
भ्रष्टाचार से परेशान हैं, भ्रष्टाचार से पीड़ित हैं,
भ्रष्टाचार से दुखी हैं,
भ्रष्टाचार ने जिनका जीवन छीन लिया,
भ्रष्टाचार ने जिनके सपने छीन लिये और
जो इसके खिलाफ संघर्षरत हैं।
अनेक कथित बुद्धिजीवी, निराश एवं पलायनवादी लोगों का कहना है कि अब तो भ्रष्टाचार की गंगा में तो हर कोई हाथ धोना चाहता है। फिर कोई भ्रष्टाचार की क्यों खिलाफत करेगा? क्योंकि भ्रष्टाचार से तो सभी के वारे-न्यारे होते हैं। जबकि सच्चाई ये नहीं है, ये सिर्फ भ्रष्टाचार का एक छोटा सा पहलु है।

यदि सच्चाई जाननी है तो निम्न तथ्यों को ध्यान से पढकर सोचें, विचारें और फिर निर्णय लें, कि कितने लोग भ्रष्टाचार के पक्ष में हो सकते हैं?

अब मेरे सीधे सवाल उन लोगों से हैं जो भ्रष्ट हैं या भ्रष्टाचार के हिमायती हैं या जो भ्रष्टाचार की गंगा में डूबकी लगाने की बात करते हैं। क्या वे उस दिन के लिए सुरक्षा कवच बना सकते हैं, जिस दिन-
1. उनका कोई अपना बीमार हो और उसे केवल इसलिए नहीं बचाया जा सके, क्योंकि उसे दी जाने वाली दवाएँ कमीशन खाने वाले भ्रष्टाचारियों द्वारा निर्धारित मानदंडों पर खरी नहीं उतरने के बाद भी अप्रूव्ड करदी गयी थी?
2. उनका कोई अपना बस में यात्रा करे और मारा जाये और उस बस की इस कारण दुर्घटना हुई हो, क्योंकि बस में लगाये गए पुर्जे कमीशन खाने वाले भ्रष्टाचारियों द्वारा निर्धारित मानदंडों पर खरे नहीं उतरने के बावजूद अप्रूव्ड कर दिए थे?
3. उनका कोई अपना खाना खाने जाये और उनके ही जैसे भ्रष्टाचारियों द्वारा खाद्य वस्तुओं में की गयी मिलावट के चलते, तडप-तडप कर अपनी जान दे दे?
4. उनका कोई अपना किसी दुर्घटना या किसी गम्भीर बीमारी के चलते अस्पताल में भर्ती हो और डॉक्टर बिना रिश्वत लिये उपचार करने या ऑपरेशन करने से साफ इनकार कर दे या विलम्ब कर दे और पीड़ित व्यक्ति बचाया नहीं जा सके?
ऐसे और भी अनेक उदाहरण गिनाये जा सकते हैं।

यहाँ मेरा आशय केवल यह बतलाना है की भ्रष्टाचार से केवल सीधे तौर पर आहत लोग ही परेशान हों ऐसा नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार वो सांप है जो उसे पालने वालों को भी नहीं पहचानता। भ्र्रष्टाचार रूपी काला नाग कब किसको डस ले, इसका कोई भी अनुमान नहीं लगा सकता! भ्रष्टाचार हर एक व्यक्ति के जीवन के लिये खतरा है। अत: हर व्यक्ति को इसे आज नहीं तो कल रोकने के लिये आगे आना ही होगा, तो फिर इसकी शुरुआत आज ही क्यों न की जाये?

उपरोक्त विवरण पढकर यदि किसी को लगता है की भ्रष्टाचार पर रोक लगनी चाहिये तो ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनाने के लिये अपने-अपने क्षेत्र में, अपने-अपने तरीके से भारत सरकार पर दबाव बनायें। केन्द्र में सरकार किसी भी दल की हो, लोकतन्त्रान्तिक शासन व्यवस्था में एकजुट जनता की बाजिब मांग को नकारना किसी भी सरकार के लिये आसान नहीं है।

क्या है? ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून"

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19.1.ग में प्रदत्त मूल अधिकार के तहत 1993 में शहीद-ए-आजम भगत सिंह की जयन्ती के दिन (26 एवं २7 सितम्बर की रात्री को) स्थापित एवं भारत सरकार की विधि अधीन दिल्ली से 6 अप्रेल, 1994 से पंजीबद्ध एवं अनुमोदित ‘‘भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान" (बास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में लगातार अनेक राज्यों के अनेक क्षेत्रों व व्यवसायों से जुडे लोगों के साथ कार्य करते हुए और 20 वर्ष 9 माह 5 दिन तक भारत सरकार की सेवा करते हुए मैंने जो कुछ जाना और अनुभव किया है, उसके अनुसार देश से भ्रष्टाचार का सफाया करने के लिये ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनाना जरूरी है, जिसके लिये केन्द्र सरकार को संसद के माध्यम से वर्तमान कानूनों में कुछ बदलाव करने होंगे एवं कुछ नए कानून बनवाने होंगे, जिनका विवरण निम्न प्रकार है :-

1-भ्रष्टाचार अजमानतीय अपराध हो और हर हाल में फैसला 6 माह में हो : सबसे पहले तो यह बात समझने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार केवल मात्र सरकारी लोगों द्वारा किया जाने वाला कुकृत्य नहीं है, बल्कि इसमें अनेक गैर-सरकारी लोग भी लिप्त रहते हैं। अत: भ्रष्टाचार या भ्रष्ट आचरण की परिभाषा को बदलकर अधिक विस्तृत किये जाने की जरूरत है। इसके अलावा इसमें केवल रिश्वत या कमीशन के लेन-देन को भ्रष्टाचार नहीं माना जावे, बल्कि किसी के भी द्वारा किसी के भी साथ किया जाने वाला ऐसा व्यवहार जो शोषण, गैर-बराबरी, अन्याय, भेदभाव, जमाखोरी, मिलावट, कालाबाजारी, मापतोल में गडबडी करना, डराना, धर्मान्धता, सम्प्रदायिकता, धमकाना, रिश्वतखोरी, उत्पीडन, अत्याचार, सन्त्रास, जनहित को नुकसान पहुँचाना, अधिनस्थ, असहाय एवं कमजोर लोगों की परिस्थितियों का दुरुपयोग आदि कुकृत्य को एवं जो मानव-मानव में विभेद करते हों, मानव के विकास एवं सम्मान को नुकसान पहुंचाते हों और जो देश की लोकतान्त्रिक, संवैधानिक, कानूनी एवं शान्तिपूर्ण व्यवस्था को भ्रष्ट, नष्ट या प्रदूषित करते हों को ‘‘भ्रष्टाचार" या "भ्रष्ट आचरण" घोषित किया जावे।

इस प्रकार के भ्रष्ट आचरण को भारतीय दण्ड संहिता में अजमानतीय एवं संज्ञेय अपराध घोषित किया जावे। ऐसे अपराधों में लिप्त लोगों को पुलिस जाँच के तत्काल बाद जेल में डाला जावे एवं उनके मुकदमों का निर्णय होने तक, उन्हें किसी भी परिस्थिति में जमानत या अन्तरिम जमानत या पेरोल पर छोडने का प्रावधान नहीं होना चाहिये। इसके साथ-साथ यह कानून भी बनाया जावे कि हर हाल में ऐसे मुकदमें की जाँच 3 माह में और मुकदमें का फैसला 6 माह के अन्दर किया जावे। अन्यथा जाँच या विचारण में विलम्ब करने पर जाँच एजेंसी या जज के खिलाफ भी जिम्मेदारी का निर्धारण करके सख्त दण्डात्मक कार्यवाही होनी चाहिये।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

..............‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून के शेष सुधार अगली किश्त में शीघ्र पढने को मिलेंगे....

पाठकों से निवेदन है कि खुलकर प्रतिक्रिया दें और बहस को आगे बढाने में सहयोग करें!

यह आलेख आप निम्न साइट्स पर भी पढ़ सकते हैं :-
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6.11.10

भ्रष्टाचार चहुँ ओर, मीडिया मचाएँ शोर!

भ्रष्टाचार चहुँ ओर, मीडिया मचाएँ शोर!


डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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गत महिने में देश में हर ओर तथा हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार का डंका बज रहा है। शोर मचाने वाले और भ्रष्टाचार में फंसने वाले सब जानते हैं कि हमाम में सभी नंगे हैं, लेकिन सबकी अपनी-अपनी मजबूरियाँ हैं। भारतीय चिकित्सा परिषद में किस प्रकार रिश्वत के लेन-देन चल रहा है और किस प्रकार से मैडीकल कॉलोजों को मान्यता प्रदान की जा रही है। इस बात का खुलासा एमसीआई अध्यक्ष केतन देसाई को करो‹डों की रिश्वत लेते पकडे जाने से हो चुका है। ललित मोदी नाम के एक बिगडेल व्यक्ति को बिना किसी जाँच पडताल के आईपीएल के सर्वेसर्वा बना दिया गया, जबकि सरकार एक चपडासी को भी नौकरी देती है तो उसका पुलिस रिकार्ड खंगाला जाता है। क्रिकेट के साम्राज्य में ललित मोदी को इतना बडा ओहदा किसने प्रदान कर दिया कि वह केवल मैच ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण आईपीएल टूर्नामेण्ट को ही फिक्स करता रहा। ललित मोदी की ताजपोशी करने वाले भी कम दोषी नहीं हैं। कुछ समय पूर्व मध्य प्रदेश में आईएएस दम्पत्ति का राज उजागर हुआ कि उन्होंने करोडों की सम्पत्ति रिश्वत के जरिये कमाई है। सेना में अनेक बार लोग पकडे जा चुके हैं।

स्वयं सीबीआई, सीआईडी और एसीबी में भी रिश्वत लेने वालों को अनेक बार पक‹डा जा चुका है। जो लोग पकड रहे हैं, कल को उनमें से भी कोई पकडा जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये। राजस्थान में सरकारी हवेलियों को तत्कालीन वसुन्धरा राजे सरकार ने ललित मोदी और उनके चाहने वालों को ओने-पौने दामों में बेच दिया गया। जयुपर में 50 किलो मीटर तक अब सरकारी जमीन ढूँढने से भी नहीं मिलती है। पिछली भाजपा की राजे सरकार के समय भू-माफिया की तरह से भूमि की खीरद-फरोख्त चल रही थी।

अब वर्तमान सरकार ने नये जयपुर का शिगूफा छोडा है और 90 बी पर पाबन्दी लगा दी है, लेकिन सैकडों मकानों का निर्माण रात दिन चल रहा है। हर मकान निर्माता 50 हजार से 1 लाख तक जयपुर विकास प्राधिकरण के अधिकारियों को भेंट चढा रहा है। यह तो नहीं माना जा सकता कि राजस्थान के आवासीय मन्त्री इतने भोले हैं कि उन्हें इस बात की जानकारी ही नहीं हो। कुल मिलाकर हर क्षेत्र में हर जगह पर भ्रष्टाचार की गंगा बह रही है, जिसमें हर कोई बेखौफ नहाने में लगा हुआ है।

लोग पकडे जाते हैं और छूट जाते हैं। बहुत कम को सांकेतिक सजा मिलती है। जिस देश में न्यायपालिका और डॉक्टर बिकाऊ हों वहाँ पर कुछ भी खरीदा जा सकता है, खरीदने वाला चाहिये। मीडिया में जो लोग शोर मचा रहे हैं, उनके दामन कितने पाक हैं, यदि लोगों के सामने आ जाये तो सारे बडे-बडे घोटाले बौने हो जायेंगे।

आप किसी भी ऐजेंसी से जाँच करवा लें भ्रष्टाचारी एवं भ्रष्टाचारियों पर रोक लगाना या उन्हें सजा मिलना नामुमकिन हो गया है। एक दो लोगों को सजा देने से भी कुछ नहीं होगा, क्योंकि रिश्वत लेने के अपराध में सजा भी तो सांकेतिक ही है। जब तक भ्रष्टाचार के अपराध में न्यूनतम आजीवन कैद एवं अधिकतम फांसी की सजा का प्रावधान नहीं होगा, तब तक लोग भ्रष्टाचार करने से परहेज करने वाले नहीं हैं। रंगे हाथ रिश्वत लेते पकडे जाने पर भी तत्काल या कुछ ही दिनों में जमानत मिल जाती है।

ऐसे में कोई क्यों किसी से डरने वाला है! जमानत पर छूटने के बाद काली कमाई के जरिये जाँच करने वालों और गवाहों को आसानी से खरीदा जा सकता है या अपराध माफिया के जरिये धमकवाया जाकर मामले को कमजोर कर दिया जाता है। इसलिये बहुत जरूरी है कि रिश्वत लेते या भ्रष्टाचार के आरोप में पकडे जाने पर आरोपी को जमानत पर छोडने का प्रावधान ही समाप्त कर दिया जाना चाहिये।

न्यायालयों में जो भ्रष्टाचार है, उसकी बडी वजह है कि न्यायाधीशों को संविधान में इतना बडा सुरक्षा कवच दे दिया है कि संसद द्वारा अविश्वास प्रस्ताव के अलावा जजों को किसी भी तरह से अपने पदों से हटाया ही नहीं जा सकता है। ऐसे में उन्हें मनमानी करने की खुली आजादी है, लेकिन जज होने से पूर्व वे समाज के व्यक्ति भी तो हैं और हर व्यक्ति में विद्यमान गुणावगुण जजों में भी मिलना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। 

इसके बावजूद भी सीबीआई या अन्य किसी भी जाँच ऐजेंसी द्वारा आज तक हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के किसी भी जज को रिश्वत लेते रंगे हाथ पकडे जाने का साहस नहीं जुटाया, जबकि यह सर्वमान्य है कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी भ्रष्टाचार है! सुप्रीम कोर्ट एक पूर्व प्रधान न्यायाधीश तक इस बात को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर चुके हैं कि न्यायपालिका में 20 प्रतिशत लोग भ्रष्ट हैं। फिर भी हम न्यायिक अवमानना के डर से इन भ्रष्ट न्यायमूर्तियों के समक्ष गुलामों की भांति नतमस्तक होकर चुप बैठै हैं!

इन हालातों में केवल आम जनता ही कुछ कर सकती है, क्योंकि इन्हीं हालातों का परिणाम है कि इस देश में नक्सलवाद दिन-दूना रात चौगना बढ रहा है।