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14.2.11

एक अंग्रेज की ईमानदार स्वीकारोक्ति


एक अंग्रेज की ईमानदार स्वीकारोक्ति

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'



"इंग्लेंड के लार्ड एंथनी लेस्टर ने सवा सौ करोड़ भारतीयों को अवसर प्रदान किया है कि वे देश के नकाबपोश कर्णधारों से सीधे सवाल करें कि भारतीय दण्ड संहिता में वे प्रावधान अभी भी क्यों हैं, जिनका भारतीय जनता एवं यहॉं की संस्कृति से कोई मेल नहीं है?"

जहॉं तक मुझे याद है, मैं 1977 से एक बात को बड़े-बड़े नेताओं से सुनता आ रहा हूँ कि भारतीय कानूनों में अंग्रेजी की मानसिकता छुपी हुई है, इसलिये इनमें आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है, लेकिन परिवर्तन कोई नहीं करता है| हर नेता ने कानूनों में बदलाव नहीं करने के लिये सबसे लम्बे समय तक सत्ता में रही कॉंग्रेस को भी खूब कोसा है| चौधरी चरण सिंह से लेकर मोरारजी देसाई, जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, चन्द्र शेखर, विश्‍वनाथ प्रताप सिंह, मुलायम सिंह, लालू यादव, रामविलास पासवान और मायावती तक सभी दलों के राजनेता सत्ताधारी पार्टी या अपने प्रतिद्वन्दी राजनेताओं को सत्ता से बेदखल करने या खुद सत्ता प्राप्त करने के लिये आम चुनावों के दौरान भारतीय कानूनों को केवल बदलने ही नहीं, बल्कि उनमें आमूलचूल परिवर्तन करने की बातें करते रहे हैं|

परन्तु अत्यन्त दु:ख की बात है कि इनमें से जो-जो भी, जब-जब भी सत्ता में आये, सत्ता में आने के बाद वे भूल ही गये कि उन्होंने भारत के कानूनों को बदलने की बात भी जनता से कही थी|

अब आजादी के छ: दशक बाद एक अंग्रेज ईमानदारी दिखाता है और भारत में आकर भारतीय मीडिया के मार्फत भारतीयों से कहता है कि भारतीय दण्ड संहिता में अनेक प्रावधान अंग्रेजों ने अपने तत्कालीन स्वार्थसाधन के लिये बनाये थे, लेकिन वे आज भी ज्यों की त्यों भारतीय दण्ड संहिता में विद्यमान हैं| जिन्हें देखकर आश्‍चर्य होता है|

इंग्लेंड के लार्ड एंथनी लेस्टर ने कॉमनवेल्थ लॉ कांफ्रेंस के अवसर पर स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारतीय दण्ड संहिता के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिये पर्याप्त और उचित संरक्षक प्रावधान नहीं हैं| केवल इतना ही नहीं, बल्कि लार्ड एंथनी लेस्टर ने यह भी साफ शब्दों में स्वीकार किया कि भारतीय दण्ड संहिता में अनेक प्रावधान चर्च के प्रभाव वाले इंग्लैंड के तत्कालीन मध्यकालीन कानूनों पर भी आधारित है, जो बहु आयामी संस्कृति वाले भारतीय समाज की जरूरतों से कतई भी मेल नहीं खाते हैं| फिर भी भारत में लागू हैं|

भारतीय प्रिण्ट एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया अनेक बेसिपैर की बातों पर तो खूब हो-हल्ला मचाता है, लेकिन इंगलैण्ड के लार्ड एंथनी लेस्टर की उक्त महत्वूपर्ण स्वीकारोक्ति एवं भारतीय दण्ड संहिता की विसंगतियों के बारे में खुलकर बात कहने को कोई महत्व नहीं दिया जाना किस बात का संकेत है?

इससे हमें यह सोचने को विवश होना पड़ता है कि मीडिया भी भारतीय राजनीति और राजनेताओं की अवसरवादी सोच से प्रभावित है| जो चुनावों के बाद अपनी बातों को पूरी तरह से भूल जाता है| लगता है कि मीडिया भी जन सरोकारों से पूरी तरह से दूर हो चुका है|

इंग्लेंड के लार्ड एंथनी लेस्टर ने सवा सौ करोड़ भारतीयों को अवसर प्रदान किया है कि वे देश के नकाबपोश कर्णधारों से सीधे सवाल करें कि भारतीय दण्ड संहिता में वे प्रावधान अभी भी क्यों हैं, जिनका भारतीय जनता एवं यहॉं की संस्कृति से कोई मेल नहीं है?

4 comments:

  1. aadarniy sir
    sadar namaskar
    pahli baar aapke blog par aai hun.aapke sbhi blogo ko padha.aur isi nishkarshh par pahunchi ki jitni baate athva apne vichar aapne vyakt kiye hain.vah waqai me ek mahtv-purn raah par kadam uthane ko prerit karti hai.
    mujhe to vah angrej hi hamse kahin behatar laga,lekin aapki baat bhi apni jagah sahi haijab satta ko apni hi chalani hai to dusre ki sahi baat use kyon sunai degi kyon ki isse unhe koi sarokar nahi hai.jahan tak midiya ka prashn hai vah bhi vahin tak bolti hai.jahan tak use apne hisaab se dikhana hota hai usme kitna sach -v-kitna jhooth haiyah kisi ko nahi pata chal pata .
    aapki soch aapki prastuti bahut hi viharniy avam sarahniy hai.
    hardik -abhnandan
    poonam

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  2. पूनम जी आपने मेरे ब्लॉग पर दस्तक दी!
    स्वागत एवं सत्कार है, आपका|
    आपने ब्लॉग्स को बढा और अपने विचारों से अवगत करवाकर, मुझे प्रोत्साहित किया|
    इसके लिये मैं आपका हृदय से आभारी हूँ|

    आशा है कि आगे भी आपका आना होता रहेगा|

    इसी विश्‍वास के साथ-शुभाकांक्षी|

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरकुश’

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  3. Sir mujhe lagta hai, ki vade karna sattdhariyon ka kam hi ban gaya hai, or ian sab ke parinam bhugtana bhartiy janta ki niyati..kya kabhee apne socha ki jab war hote to, kya vo janta chahte hai,kabhee nahi na..par fir bhe war hote hai..Ye neta log apne kisi ko kabhee fauj me nahi bhijte or baithe- baithe jang ka ailan karte hain.....

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